एक बस्ती ऐसी भी जहां ताला खुलने से तय होता है शौचालय का वक्त

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पूरे देश को ओडीएफ करने निकली मोदी एक्सप्रेस का इंजन भोपाल की एक बस्ती में आकर फेल हो गया है. आलम ये है कि बस्ती में शौचालय नहीं होने की वजह से महिलाओं को शौचालय जाने के लिए रोजाना 5 रुपए खर्च करने पड़ते हैं. उससे भी बढ़कर ये कि इनके शौचालय जाने का वक्त बस्ती के पास बने सुलभ शौचालय के खुलने और बंद होने से तय होता है.

ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या यही है असली स्वच्छ भारत? गलियों के बीच पत्थर की दीवारों से घिरी इस बस्ती के जितने भीतर जाएंगे स्वच्छ भारत की उतनी गंदी तस्वीर आपके सामने होगी.

राजधानी भोपाल की पम्पापुर बस्ती, जिनमें लाचारी से लेकर लानत तक सब शामिल है और शामिल है सरकारी दावों की वो हकीकत जो झूठ के पुलिंदे में अक्सर सियासी फायदे के लिए लोगों के बीच उछाली जाती है. क्या आप यकीन करेंगे कि राज्य सरकार की नाक के नीचे राजधानी भोपाल में एक बस्ती ऐसी भी है जहां ताला खुलने से शौचालय का वक्त तय होता है.

ऐसा नहीं है कि बस्ती के लोगों ने शौचालय के लिए जिम्मेदारों से गुहार नहीं लगाई. लेकिन चुनाव के दौरान घड़ी घड़ी बनने वाला शौचालय नतीजों के बाद कायदों कानून में इतना उलझा कि उलझता ही चला गया. और देखते ही देखते समस्या से सियासत हो गया.

स्वच्छ भारत रैंकिंग में दूसरे पायदान पर काबिज भोपाल की भोपाल से पहचान कराने पर हकीकत सामने है. बड़ा सवाल ये कि स्वच्छता की ये कैसी रिपोर्ट और कैसे अभियान हैं जो सरकार की नाक के नीचे फेल हैं.

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