सभी दवाइयों की कीमत पर नियंत्रण नहीं, मरीजों से वसूल रहे 500 गुना ज्यादा

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मरीजों को महंगी दवाइयों से राहत दिलवाने के लिए सरकार कई कोशिश कर चुकी है लेकिन हकीकत यह है कि अब भी दवाइयों के उत्पादन मूल्य से सैकड़ों प्रतिशत ज्यादा मुनाफा लिया जा रहा है। जो दवाई रिटेल मेडिकल स्टोर पर 106 रुपए एमआरपी पर बेची जा रही है, वही महज 23 रुपए में होलसेल स्टोर पर उपलब्ध करवाई जा रही है। इसका कारण यह है कि सरकार का सभी दवाइयों की कीमत पर नियंत्रण नहीं है।

नेशनल फार्मासुटिकल प्राइजिंग अथॉरिटी के मुख्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक ‘ड्रग प्राइज कंट्रोल ऑर्डर 2013’ में दवाइयों की एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) को लगातार कम किया जा रहा है। अब तक 822 कॉम्बिनेशन की एमआरपी को नियंत्रित किया जा चुका है। अनिवार्य श्रेणी की अधिकतर दवाइयां इसमें शामिल हो चुकी हैं। जो दवाइयां मूल्य नियंत्रण से बाहर हैं उनके निर्माता सालाना 10 फीसदी एमआरपी बढ़ाकर बेचने के लिए स्वतंत्र हैं।

हर स्तर पर बंट रहा कमीशन

दवा बाजार के पदाधिकारियों, होलसेलर्स और रिटेलर्स स्वीकार कर रहे हैं कि मनमानी एमआरपी के कारण मरीजों को 400 से 500 गुना तक पैसा देना पड़ रहा है। दरअसल दवाइयां लिखने से लेकर ग्राहक को बेचने तक में हर जगह कमीशन बंटता है। दवाइयों के विज्ञापन पर मोटी रकम खर्च की जाती है। जो डॉक्टर दवा लिखता है उसे भी कमीशन दिया जाता है और जो रिटेलर दवाई बेचता है उसे भी मोटा कमीशन और मुनाफा जाता है। इस कारण होलसेल रेट और एमआरपी में अंतर रखा जाता है ताकि हर स्तर पर मोटी कमाई की जा सके।

जेनेरिक-ब्रांडेड की पहचान का कोई तरीका नहीं

मरीजों के हितों को ध्यान में रखकर लगातार जेनेरिक दवाइयां लिखने और उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है लेकिन निजी मेडिकल स्टोर्स पर ये मरीजों तक नहीं पहुंच रही। इसका कारण है कि जेनेरिक और ब्रांडेड दवाइयों में फर्क जानने-पहचान का कोई तरीका नहीं है। ड्रग इन्स्पेक्टरों से लेकर आयुक्त तक इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि दोनों तरह की दवाइयों की पहचान करने में आम लोग ही नहीं, विभाग के अधिकारी तक सफल नहीं हो पाते हैं क्योंकि इन पर पहचान के लिए कुछ नहीं लिखा होता। कोई निशान, संकेत या अक्षर लिखे हों तो खरीदारों को राहत मिल सकती है।

एमआरपी और होलसेल रेट में अंतर

दवाइयों का मूल्य नियंत्रण एनपीपीए करता है। हाल ही में कुछ दवाइयों के मूल्य कम किए गए हैं। राज्य स्तर पर गुणवत्ता और दूसरे पक्षों पर जांच होती है। ब्रांडेड और जेनेरिक के अंतर के लिए कोई पहचान नहीं होती। इस संबंध में एनपीपीए से ज्यादा जानकारी मिल सकती है। — डॉ. पल्लवी जैन गोविल, नियंत्रक, खाद्य एवं औषधि प्रशासन

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