सिल्क रूट में भारत के नहीं होने से तिलमिलाया चीन

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बीजिंग। वन बेल्ट, वन रोड (ओबोर) यानी सिल्क रूट पर हुए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन से भारत की दूरी को चीन पचा नहीं पा रहा है।

मंगलवार को उसकी मीडिया ने भारत के इन्कार को घरेलू राजनीतिक तमाशा बताया, तो विदेश मंत्रालय ने पूछा कि इसका हिस्सा बनने के लिए भारत किस तरह की बातचीत चाहता है।

जल, थल मार्ग से एशिया, यूरोप और अफ्रीका के 65 देशों को जोड़ने वाली चीन की इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर सोमवार को समाप्त हुए सम्मेलन में सौ से ज्यादा देशों ने हिस्सा लिया था।

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ सहित 29 देशों की सरकार के मुखिया मौजूद थे। गुलाम कश्मीर से गुजरने वाले चीन-पाक आर्थिक गलियारे के कारण भारत इसमें शरीक नहीं हुआ।

चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मिली प्रतिक्रिया का हवाला देते हुए कहा कि बीजिंग शुरुआत से ही चाहता रहा है कि भारत इस परियोजना का हिस्सा बने।

शुरुआत से ही परियोजना व्यापक परामर्श, संयुक्त साझेदारी और साझा लाभ के सिद्धांत पर आधारित है। ऐसे में हम समझ नहीं पा रहे हैं कि अर्थपूर्ण संवाद से भारत का तात्पर्य क्या है।

वे हमें सार्वजनिक या कूटनीतिक तरीके से इसके बारे में बता सकते हैं। सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के दिए संबोधन का हवाला देते हुए चुनयिंग ने कहा कि इस परियोजना का मकसद किसी देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता में दखल देना नहीं है।

कश्मीर विवाद भारत-पाक का द्विपक्षीय मसला है और बीजिंग का मानना है कि दोनों देशों को बातचीत से इसका हल निकालना चाहिए। सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने अपने संपादकीय में कहा है, दोस्ताना संबंध भारत और चीन दोनों के हित में है। भारत चाहता है कि चीन उसके हितों पर विशेष ध्यान दे।

पर इसके लिए सही तरीके से संवाद कायम नहीं किया जा रहा। अखबार के मुताबिक ओबोर पर भारत की आपत्ति का कारण घरेलू राजनीति है। इसका मकसद चीन पर दबाव बनाना है।

लेकिन, भारत की गैर मौजूदगी का इस पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इस पहल से दुनिया की जो तरक्की होगी उस पर भी इसका असर नहीं पड़ेगा।

अखबार ने लिखा है कि यदि भारत खुद को एक बड़ी ताकत के रूप में देखता है तो उसे चीन के साथ बहुत सी असहमतियों का अभ्यस्त होना चाहिए। चीन के साथ इन असहमतियों से निपटने का प्रयास करना चाहिए।

यह लगभग असंभव है कि दो बड़े देश सभी चीजों को लेकर समझौते पर पहुंच जाएं। इस बात को चीन और अमेरिका के बीच के मतभेदों से समझा जा सकता है। इसके बावजूद दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंध बना रखे हैं, जिससे भारत सीख सकता है।

 

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